{"_id":"6aef1d600da3ffaa9906b802","slug":"us-politics-jd-vance-distancing-donald-trump-bolton-2028-race-2026-11-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"'हार का ठीकरा ईरान पर और नजर राष्ट्रपति की कुर्सी पर': पूर्व एनएसए का दावा; ट्रंप से दूरी बना रहे हैं वेंस?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
'हार का ठीकरा ईरान पर और नजर राष्ट्रपति की कुर्सी पर': पूर्व एनएसए का दावा; ट्रंप से दूरी बना रहे हैं वेंस?
Sat, 07 Nov 2026 06:15 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, वाशिंगटन।
पीटीआई, वाशिंगटन।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 07 Nov 2026 06:15 PM IST
सार
पूर्व अमेरिकी एनएसए जॉन बोल्टन ने दावा किया है कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी के तहत रिपब्लिकन पार्टी की मिडटर्म हार का ठीकरा ईरान युद्ध पर फोड़कर ट्रंप से दूरी बना रहे हैं। बोल्टन के अनुसार, मतदाताओं की नाराजगी की असल वजह बढ़ती महंगाई, अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत और ट्रंप की टैरिफ नीतियां थीं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वाशिंगटन के घरेलू राजनीतिक ड्रामे के कारण भारत के साथ रक्षा और सुरक्षा जैसे अहम विदेश नीति के मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।
विज्ञापन
जॉन बोल्टन, डोनाल्ड ट्रंप सरकार के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अमेरिका की राजनीति में इन दिनों अंदरखाने बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस आने वाले साल 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। इसी राजनीतिक मकसद के तहत वे मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपनी दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बोल्टन का कहना है कि वेंस ने हाल ही में रिपब्लिकन पार्टी को मिडटर्म चुनावों में मिली हार का ठीकरा ईरान युद्ध पर फोड़ा है, जो कि एक बहुत बड़ी राजनीतिक गलती और बेहद जोखिम भरा कदम है।
रिपब्लिकन पार्टी की हार की असली वजह क्या?
जॉन बोल्टन ने जेडी वेंस के इस दावे को सिरे से खारिज किया है कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध ही रिपब्लिकन पार्टी की हार की एकमात्र वजह थी। उन्होंने कहा कि जनता सिर्फ एक मुद्दे से नाराज नहीं थी, बल्कि उनकी नाराजगी की असली वजह देश की अर्थव्यवस्था, लगातार बढ़ती महंगाई और ट्रंप की टैक्स पॉलिसी यानी टैरिफ थीं। मतदाताओं ने 2024 के चुनाव में ट्रंप पर भरोसा जताया था कि वे बाइडन-हैरिस प्रशासन की तुलना में अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से संभालेंगे, लेकिन सत्ता में आने के बाद ट्रंप प्रशासन इन उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहा। इसके अलावा, ईरान के साथ चले संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस के दाम बढ़ा दिए, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा की लागत काफी ज्यादा बढ़ गई और ट्रंप ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
क्या मिडटर्म नतीजों से ट्रंप बदलेंगे अपनी कार्यशैली?
मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के शानदार प्रदर्शन को बोल्टन ने ट्रंप की लीडरशिप शैली के खिलाफ जनता का एक कड़ा और तीखा गुस्सा बताया है। उनका मानना है कि पिछले दस वर्षों से ट्रंप का काम करने का तरीका बिल्कुल नहीं बदला है, वे किसी के साथ मिलकर काम करने के बजाय खुद को जनता का सीधा प्रतिनिधि मानते हैं और अपनी मर्जी से फैसले लेते हैं। चुनाव में करारी हार मिलने के बाद भी इस बात की कोई संभावना नहीं है कि ट्रंप अपने कार्यकाल के बाकी बचे दो वर्षों में अपने काम करने के इस अंदाज में कोई बदलाव करेंगे। इसके साथ ही, अब डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली नई कांग्रेस ट्रंप प्रशासन के खिलाफ भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों की जांच भी शुरू कर सकती है।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: यूपी से अमेरिकी राजनीति तक: कड़ाके की ठंड में घर-घर जाकर मांगे वोट, सबा हैदर ने बताया कैसे जीता चुनाव?
क्या भारत-अमेरिका रिश्ते प्रभावित होंगे?
अमेरिका के इन घरेलू राजनीतिक हालातों और उठापटक का सीधा असर देश की विदेश नीति पर भी पड़ सकता है। जॉन बोल्टन ने आशंका जताई है कि वाशिंगटन में चल रहे अंदरूनी राजनीतिक ड्रामे की वजह से विदेश नीति के अहम मुद्दे पूरी तरह पीछे छूट जाएंगे। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों को उठाना पड़ सकता है, खासकर तब जब दोनों देशों को चीन के मोर्च पर मिलकर रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा सहयोग तथा साझा सुरक्षा प्राथमिकताओं पर होने वाली महत्वपूर्ण चर्चाएं घरेलू राजनीतिक विवादों की भेंट चढ़ सकती हैं, जबकि चीन के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते दखल से निपटने के लिए दोनों देशों का मिलकर काम करना बेहद जरूरी है।
विज्ञापन
रिपब्लिकन पार्टी की हार की असली वजह क्या?
जॉन बोल्टन ने जेडी वेंस के इस दावे को सिरे से खारिज किया है कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध ही रिपब्लिकन पार्टी की हार की एकमात्र वजह थी। उन्होंने कहा कि जनता सिर्फ एक मुद्दे से नाराज नहीं थी, बल्कि उनकी नाराजगी की असली वजह देश की अर्थव्यवस्था, लगातार बढ़ती महंगाई और ट्रंप की टैक्स पॉलिसी यानी टैरिफ थीं। मतदाताओं ने 2024 के चुनाव में ट्रंप पर भरोसा जताया था कि वे बाइडन-हैरिस प्रशासन की तुलना में अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से संभालेंगे, लेकिन सत्ता में आने के बाद ट्रंप प्रशासन इन उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहा। इसके अलावा, ईरान के साथ चले संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस के दाम बढ़ा दिए, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा की लागत काफी ज्यादा बढ़ गई और ट्रंप ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
विज्ञापन
क्या मिडटर्म नतीजों से ट्रंप बदलेंगे अपनी कार्यशैली?
मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के शानदार प्रदर्शन को बोल्टन ने ट्रंप की लीडरशिप शैली के खिलाफ जनता का एक कड़ा और तीखा गुस्सा बताया है। उनका मानना है कि पिछले दस वर्षों से ट्रंप का काम करने का तरीका बिल्कुल नहीं बदला है, वे किसी के साथ मिलकर काम करने के बजाय खुद को जनता का सीधा प्रतिनिधि मानते हैं और अपनी मर्जी से फैसले लेते हैं। चुनाव में करारी हार मिलने के बाद भी इस बात की कोई संभावना नहीं है कि ट्रंप अपने कार्यकाल के बाकी बचे दो वर्षों में अपने काम करने के इस अंदाज में कोई बदलाव करेंगे। इसके साथ ही, अब डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली नई कांग्रेस ट्रंप प्रशासन के खिलाफ भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों की जांच भी शुरू कर सकती है।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: यूपी से अमेरिकी राजनीति तक: कड़ाके की ठंड में घर-घर जाकर मांगे वोट, सबा हैदर ने बताया कैसे जीता चुनाव?
क्या भारत-अमेरिका रिश्ते प्रभावित होंगे?
अमेरिका के इन घरेलू राजनीतिक हालातों और उठापटक का सीधा असर देश की विदेश नीति पर भी पड़ सकता है। जॉन बोल्टन ने आशंका जताई है कि वाशिंगटन में चल रहे अंदरूनी राजनीतिक ड्रामे की वजह से विदेश नीति के अहम मुद्दे पूरी तरह पीछे छूट जाएंगे। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों को उठाना पड़ सकता है, खासकर तब जब दोनों देशों को चीन के मोर्च पर मिलकर रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा सहयोग तथा साझा सुरक्षा प्राथमिकताओं पर होने वाली महत्वपूर्ण चर्चाएं घरेलू राजनीतिक विवादों की भेंट चढ़ सकती हैं, जबकि चीन के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते दखल से निपटने के लिए दोनों देशों का मिलकर काम करना बेहद जरूरी है।