{"_id":"6ae77768ecb04d8caa0ade05","slug":"mothers-observed-a-fast-on-ahoi-ashtami-and-offered-arghya-libation-to-the-stars-bulandshahr-news-c-133-1-bul1002-169801-2026-11-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bulandshahar News: अहोई अष्टमी पर माताओं ने रखा व्रत, तारों को दिया अर्घ्य","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bulandshahar News: अहोई अष्टमी पर माताओं ने रखा व्रत, तारों को दिया अर्घ्य
विज्ञापन
खुर्जा में अहोई माता का पूजन कर पाठ करतीं महिलाएं। संवाद
बुलंदशहर/खुर्जा/बुगरासी/शिकारपुर/नरौरा। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रविवार को जिलेभर में अहोई अष्टमी का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया गया। माताओं ने अपने पुत्रों की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली के लिए निर्जला व्रत रखा। दिनभर उपवास करने के बाद शाम को अहोई माता की पूजा-अर्चना की और तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया। घरों में महिलाओं ने अहोई माता के चित्र के सामने दीप जलाकर पूजन किया।
सुबह स्नान-ध्यान के बाद महिलाओं ने व्रत का संकल्प लिया। दिनभर अन्न-जल ग्रहण किए बिना संतान की मंगलकामना की। शाम को पूजा की तैयारी करते हुए अहोई माता के चित्र के सामने पूजन सामग्री रखी गई।
महिलाओं ने माता को रोली, चावल, फूल और मिठाई अर्पित की। कई स्थानों पर सिंघाड़े, मूली और गन्ने सहित अन्य मौसमी फल चढ़ाकर पूजा की गई। इसके बाद अहोई माता की कथा सुनी गई और परिवार की सुख-शांति की कामना की गई।
विज्ञापन
धार्मिक मान्यता के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। परंपरागत रूप से यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को तारों के दर्शन करने के बाद अर्घ्य देती हैं। कुछ स्थानों पर चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी है।
अहोई माता की पूजा में स्याहू और उसके बच्चों की कथा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि कथा सुनने और श्रद्धापूर्वक पूजा करने से संतान पर माता की कृपा बनी रहती है। पूजा के दौरान महिलाओं ने परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की। शाम होते ही आसमान में तारों के दिखाई देने का इंतजार शुरू हो गया।
तारों के दर्शन और पूजन के साथ ही व्रत की धार्मिक परंपराएं पूरी की गईं। पर्व को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह दिखाई दिया।
विज्ञापन
सुबह स्नान-ध्यान के बाद महिलाओं ने व्रत का संकल्प लिया। दिनभर अन्न-जल ग्रहण किए बिना संतान की मंगलकामना की। शाम को पूजा की तैयारी करते हुए अहोई माता के चित्र के सामने पूजन सामग्री रखी गई।
विज्ञापन
महिलाओं ने माता को रोली, चावल, फूल और मिठाई अर्पित की। कई स्थानों पर सिंघाड़े, मूली और गन्ने सहित अन्य मौसमी फल चढ़ाकर पूजा की गई। इसके बाद अहोई माता की कथा सुनी गई और परिवार की सुख-शांति की कामना की गई।
विज्ञापन
धार्मिक मान्यता के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। परंपरागत रूप से यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को तारों के दर्शन करने के बाद अर्घ्य देती हैं। कुछ स्थानों पर चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी है।
अहोई माता की पूजा में स्याहू और उसके बच्चों की कथा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि कथा सुनने और श्रद्धापूर्वक पूजा करने से संतान पर माता की कृपा बनी रहती है। पूजा के दौरान महिलाओं ने परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की। शाम होते ही आसमान में तारों के दिखाई देने का इंतजार शुरू हो गया।
तारों के दर्शन और पूजन के साथ ही व्रत की धार्मिक परंपराएं पूरी की गईं। पर्व को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह दिखाई दिया।