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वीरेन डंगवाल की कविता- बिटिया कैसे साध लेती है इन आँसुओं को तू

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  बिटिया कैसे साध लेती है इन आँसुओं को तू
कि वे ठीक तेरे खुले हुए मुँह के भीतर लुढ़क जाते हैं
सड़क पर जाते ऊँट को देखते-देखते भी
टप-टप जारी रहता है जो
अरे वाह, ये तेरा रोना

बेटी, खेतों में पतली लतरों पर फलते हैं तरबूज
और आसमान पर फलते हैं तारे
हमारे मन में फलती हैं अभिलाषाएँ
ककड़ियाँ ऐसी
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एक दिन बड़ी होना
सब जगह घूमना तू
हमारी इच्छाओं को मज़बूत जूतों की तरह पहने
प्रेम करना निर्बाध
नीचे झाँक कर सूर्य को उगते हुए देखना

हम नहीं होंगे
लेकिन ऐसे ही तो
अनुपस्थित लोग
जा पहुँचते हैं भविष्य तक
3 वर्ष पहले
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