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VIDEO: मोगली की कहानी का असली किरदार बदहाल, नगर निगम के गोदाम में जंग खा रही प्रतिमा!
आगरा के इतिहास में जंगलों से निकलकर इंसानी दुनिया में आए दीना शनीचर की कहानी बेहद अनोखी और ऐतिहासिक है। उन्नीसवीं सदी के इस चर्चित भेड़िया मानव को प्रसिद्ध लेखक रूडयार्ड किपलिंग की विश्वप्रसिद्ध रचना द जंगल बुक के मुख्य किरदार मोगली की वास्तविक प्रेरणा माना जाता है। शहर में कबाड़ और लोहे के टुकड़ों को जोड़कर बनाई गई दीना शनीचर की एक सुंदर प्रतिमा पिछले लंबे समय से नगर निगम के स्टोर में बंद पड़ी है और सही रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो रही है। फरवरी 1868 में बुलंदशहर के जंगलों में भेड़ियों की गुफा से मिले इस छह वर्षीय बालक को आगरा लाया गया था। सिकंदरा स्थित अनाथालय में शनिवार के दिन लाए जाने के कारण इनका नाम शनीचर रखा गया था। शुरुआत में चार पैरों पर चलने वाले और केवल कच्चा मांस खाने वाले शनीचर ने अनाथालय के कर्मचारियों के प्रयास से दो पैरों पर चलना और बर्तन से पानी पीना सीखा, हालांकि वे कभी इंसानी भाषा नहीं सीख पाए। इंसानी समाज में आकर उन्होंने केवल धूम्रपान की आदत अपनाई और वे अत्यधिक बीड़ी पीने लगे थे। दीना शनीचर और सिकंदरा अनाथालय से जुड़ी इस अनोखी घटना से ही प्रेरित होकर रूडयार्ड किपलिंग ने 1894 में द जंगल बुक लिखी थी, जिसने पूरी दुनिया में मोगली के किरदार को अमर बना दिया। अत्यधिक धूम्रपान के कारण फेफड़ों के संक्रमण और तपेदिक की बीमारी से 1895 में लगभग पैंतीस वर्ष की आयु में सिकंदरा अनाथालय परिसर में ही दीना शनीचर की मृत्यु हो गई थी। इतिहास के इस दुर्लभ किस्से को शहरवासियों और पर्यटकों के सामने जीवंत करने के उद्देश्य से कबाड़ सामग्री का उपयोग करके शनीचर की एक आकर्षक प्रतिमा तैयार कराई गई थी। योजना थी कि इसे शहर के किसी प्रमुख चौराहे, पार्क या पर्यटन स्थल पर स्थापित किया जाएगा। प्रशासनिक अनदेखी के कारण यह कलाकृति अब तक किसी सार्वजनिक स्थान की शोभा नहीं बन सकी है। नगर निगम के अंधेरे गोदाम में रखे रहने से इस पर जंग लग रही है और यह धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। स्थानीय इतिहासप्रेमी और नागरिक मांग कर रहे हैं कि कबाड़ से बनी इस अनूठी प्रतिमा को तुरंत सिकंदरा या शहर के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किया जाए ताकि आगरा से जुड़े इस ऐतिहासिक अध्याय को नई पहचान मिल सके।
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