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तमिलनाडु में किताबों की खरीद पर विवाद: द्रमुक पर एआई से फर्जी किताबें बनाने का आरोप; पार्टी ने क्या जवाब दिया?
Sat, 07 Nov 2026 08:19 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, चेन्नई।
पीटीआई, चेन्नई।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 07 Nov 2026 08:19 PM IST
सार
तमिलनाडु में सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए किताबों की खरीद में कथित गड़बड़ी को लेकर सियासी घमासान छिड़ गया है। सरकार ने पिछली द्रमुक सरकार पर एआई से घटिया किताबें तैयार कराने और फर्जी लेखकों के नाम इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। द्रमुक ने आरोपों पर क्या कहा, पूरा विवाद है क्या? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
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ए राजमोहन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
तमिलनाडु में सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए किताबों की खरीद को लेकर विवाद बढ़ गया है। राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री ए राजमोहन ने शनिवार को पूर्ववर्ती द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि 'पेरियार अरिवुलगम' और राज्य के दूसरे सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए किताबें खरीदने में गड़बड़ी हुई थी। उन्होंने इसे 'भारत का पहला एआई घोटाला बताया।
विपक्षी दल द्रमुक ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी ने कहा कि उसकी सरकार पर लगाए गए घोटाले के आरोप गलत हैं। द्रमुक ने तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार से किताबों की खरीद से जुड़े दस्तावेज जारी करने की मांग की।
सरकार ने क्या आरोप लगाया?
मंत्री ए राजमोहन ने शनिवार को चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली द्रमुक सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके घटिया और आपत्तिजनक किताबें तैयार कराईं।
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उन्होंने कहा कि इन किताबों पर 'थमराई मुरली', 'कमलांबल करुणानिधि' और 'त्रिशा विजय' जैसे काल्पनिक लेखकों के नाम लिखे गए।
राजमोहन ने आरोप लगाया, यह भारत का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस घोटाला है। द्रमुक ने पेरियार पुस्तकालय के मामले में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करने के लिए एआई का इस्तेमाल किया है।
एक ही प्रकाशक को हजारों किताबों का ऑर्डर दिए?
मंत्री ने आरोप लगाया कि एक ही प्रकाशक 'अगल विलक्कु पथिप्पगम' को हजारों किताबों के ऑर्डर दिए गए थे। ये ऑर्डर 14 फरवरी को जारी किए गए थे। इसमें सात दिनों के भीतर किताबें पहुंचाने की शर्त रखी गई थी। उन्होंने दावा किया कि चुनाव से पहले मार्च में ही राज्य के खजाने से इन किताबों का भुगतान कर दिया गया था।
राजमोहन ने कहा, इन किताबों की सामग्री पूरी तरह मशीन से तैयार किया गया बकवास लेखन है। उदाहरण के लिए, प्राचीन रचना 'नालडियार' को एक व्यक्ति का लिखा हुआ दार्शनिक ग्रंथ बताया गया है। उन्होंने द्रमुक से तमिलनाडु के छात्रों और लोक सेवा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों से बिना किसी शर्त के माफी की मांग की।
सरकार ने जांच के लिए क्या कदम उठाए?
मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार ने सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि सरकार एक विशेष समिति भी बनाएगी। यह समिति कई सार्वजनिक पुस्तकालयों में किताबों की खरीद की जांच करेगी। इनमें कामराजर पुस्तकालय, अन्ना पुस्तकालय और कलैग्नार शताब्दी पुस्तकालय शामिल हैं।
आरोपों पर द्रमुक ने क्या कहा?
मंत्री के आरोपों पर द्रमुक नेता आई परंथामेन ने पलटवार किया। उन्होंने इन आरोपों को 'फर्जी कहानी' बताया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार अपनी प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए ऐसा कर रही है।
ये भी पढ़ें: दिवाली पर महाराष्ट्र में एफडीए की कार्रवाई: 43 लाइसेंस निलंबित, ब्लिंकिट पर भी कार्रवाई; कहां मिली गड़बड़ी?
परंथामेन ने शनिवार को चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने सवाल उठाया, अगर आरोप है कि किताबें घटिया हैं या उनमें गलतियां हैं, तो सत्ता में बैठी सरकार ने उन्हें तुरंत पुस्तकालयों की अलमारियों से हटाने का आदेश क्यों नहीं दिया? उन्होंने मंत्री पर विभागीय कार्रवाई करने के बजाय डीवीएसी में शिकायत दर्ज कराकर राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया।
द्रमुक नेता ने राज्य सरकार को सोशल मीडिया अभियानों के बजाय आधिकारिक दस्तावेज जारी करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि सरकार को अपनी आईटी विंग के सोशल मीडिया अभियानों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने कहा, सरकार ऑनलाइन बैंक लेनदेन का ब्योरा, खरीद के ऑर्डर जारी करने की तारीखें और विशेषज्ञ समितियों की ओर से की गई सटीक सिफारिशें खुले तौर पर सार्वजनिक करे।
परंथामेन ने बताया कि उनकी पार्टी की सरकार ने 2024 में एक सरकारी आदेश के जरिये पारदर्शी ऑनलाइन खरीद नीति लागू की थी। इसका उद्देश्य विशेष विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से किताबों की खरीद को नियंत्रित करना था।
द्रमुक नेता ने किताबों की खरीद से जुड़ी तारीखों में अंतर होने का मुद्दा उठाया। परंथामेन ने दावा किया कि विवादित किताबों पर जून 2026 में पुस्तकालय की मुहर लगी थी। तब तक द्रमुक की सरकार का कार्यकाल खत्म हो चुका था। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में मार्च में खरीदी गई किताबों में ऐसी कोई समस्या नहीं आई थी।
फर्जी लेखकों के नाम पर किताबें तैयार कराने के आरोपों को खारिज करते हुए परंथामेन ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी कभी 'त्रिशा विजय' या 'संगीता विजय' नाम के लेखकों की किताबों को मंजूरी नहीं देगी। उन्होंने कहा, द्रमुक एक बौद्धिक आंदोलन है... हम उनकी तरह अधूरी जानकारी वाले फर्जी रील बनाकर राजनीति नहीं करते। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे कथित सरकारी पत्रों में वर्तनी की गलतियां होने की बात भी कही।
पेरुमल मुरुगन ने कैसे उठाया था मामला?
इस पूरे विवाद को सबसे पहले मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने सामने लाया था। वह 137 सदस्यों वाली किताबों के चयन की समिति में शामिल थे। राज्य सरकार ने उन्हें घोटाले का खुलासा करने वाला व्यक्ति बताया। सरकार ने कहा कि उन्होंने इस मामले को उजागर किया।
हालांकि, द्रमुक का कहना है कि पेरुमल मुरुगन जैसे समिति के सदस्यों को भी इन काल्पनिक किताबों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पार्टी ने इस मामले की पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। उसने कहा कि जांच के जरिए असली दोषियों का पता लगाया जाना चाहिए।
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विपक्षी दल द्रमुक ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी ने कहा कि उसकी सरकार पर लगाए गए घोटाले के आरोप गलत हैं। द्रमुक ने तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार से किताबों की खरीद से जुड़े दस्तावेज जारी करने की मांग की।
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सरकार ने क्या आरोप लगाया?
मंत्री ए राजमोहन ने शनिवार को चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली द्रमुक सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके घटिया और आपत्तिजनक किताबें तैयार कराईं।
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उन्होंने कहा कि इन किताबों पर 'थमराई मुरली', 'कमलांबल करुणानिधि' और 'त्रिशा विजय' जैसे काल्पनिक लेखकों के नाम लिखे गए।
राजमोहन ने आरोप लगाया, यह भारत का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस घोटाला है। द्रमुक ने पेरियार पुस्तकालय के मामले में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करने के लिए एआई का इस्तेमाल किया है।
एक ही प्रकाशक को हजारों किताबों का ऑर्डर दिए?
मंत्री ने आरोप लगाया कि एक ही प्रकाशक 'अगल विलक्कु पथिप्पगम' को हजारों किताबों के ऑर्डर दिए गए थे। ये ऑर्डर 14 फरवरी को जारी किए गए थे। इसमें सात दिनों के भीतर किताबें पहुंचाने की शर्त रखी गई थी। उन्होंने दावा किया कि चुनाव से पहले मार्च में ही राज्य के खजाने से इन किताबों का भुगतान कर दिया गया था।
राजमोहन ने कहा, इन किताबों की सामग्री पूरी तरह मशीन से तैयार किया गया बकवास लेखन है। उदाहरण के लिए, प्राचीन रचना 'नालडियार' को एक व्यक्ति का लिखा हुआ दार्शनिक ग्रंथ बताया गया है। उन्होंने द्रमुक से तमिलनाडु के छात्रों और लोक सेवा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों से बिना किसी शर्त के माफी की मांग की।
सरकार ने जांच के लिए क्या कदम उठाए?
मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार ने सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि सरकार एक विशेष समिति भी बनाएगी। यह समिति कई सार्वजनिक पुस्तकालयों में किताबों की खरीद की जांच करेगी। इनमें कामराजर पुस्तकालय, अन्ना पुस्तकालय और कलैग्नार शताब्दी पुस्तकालय शामिल हैं।
आरोपों पर द्रमुक ने क्या कहा?
मंत्री के आरोपों पर द्रमुक नेता आई परंथामेन ने पलटवार किया। उन्होंने इन आरोपों को 'फर्जी कहानी' बताया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की सरकार अपनी प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए ऐसा कर रही है।
ये भी पढ़ें: दिवाली पर महाराष्ट्र में एफडीए की कार्रवाई: 43 लाइसेंस निलंबित, ब्लिंकिट पर भी कार्रवाई; कहां मिली गड़बड़ी?
परंथामेन ने शनिवार को चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने सवाल उठाया, अगर आरोप है कि किताबें घटिया हैं या उनमें गलतियां हैं, तो सत्ता में बैठी सरकार ने उन्हें तुरंत पुस्तकालयों की अलमारियों से हटाने का आदेश क्यों नहीं दिया? उन्होंने मंत्री पर विभागीय कार्रवाई करने के बजाय डीवीएसी में शिकायत दर्ज कराकर राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया।
द्रमुक नेता ने राज्य सरकार को सोशल मीडिया अभियानों के बजाय आधिकारिक दस्तावेज जारी करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि सरकार को अपनी आईटी विंग के सोशल मीडिया अभियानों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने कहा, सरकार ऑनलाइन बैंक लेनदेन का ब्योरा, खरीद के ऑर्डर जारी करने की तारीखें और विशेषज्ञ समितियों की ओर से की गई सटीक सिफारिशें खुले तौर पर सार्वजनिक करे।
परंथामेन ने बताया कि उनकी पार्टी की सरकार ने 2024 में एक सरकारी आदेश के जरिये पारदर्शी ऑनलाइन खरीद नीति लागू की थी। इसका उद्देश्य विशेष विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से किताबों की खरीद को नियंत्रित करना था।
द्रमुक नेता ने किताबों की खरीद से जुड़ी तारीखों में अंतर होने का मुद्दा उठाया। परंथामेन ने दावा किया कि विवादित किताबों पर जून 2026 में पुस्तकालय की मुहर लगी थी। तब तक द्रमुक की सरकार का कार्यकाल खत्म हो चुका था। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में मार्च में खरीदी गई किताबों में ऐसी कोई समस्या नहीं आई थी।
फर्जी लेखकों के नाम पर किताबें तैयार कराने के आरोपों को खारिज करते हुए परंथामेन ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी कभी 'त्रिशा विजय' या 'संगीता विजय' नाम के लेखकों की किताबों को मंजूरी नहीं देगी। उन्होंने कहा, द्रमुक एक बौद्धिक आंदोलन है... हम उनकी तरह अधूरी जानकारी वाले फर्जी रील बनाकर राजनीति नहीं करते। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे कथित सरकारी पत्रों में वर्तनी की गलतियां होने की बात भी कही।
पेरुमल मुरुगन ने कैसे उठाया था मामला?
इस पूरे विवाद को सबसे पहले मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने सामने लाया था। वह 137 सदस्यों वाली किताबों के चयन की समिति में शामिल थे। राज्य सरकार ने उन्हें घोटाले का खुलासा करने वाला व्यक्ति बताया। सरकार ने कहा कि उन्होंने इस मामले को उजागर किया।
हालांकि, द्रमुक का कहना है कि पेरुमल मुरुगन जैसे समिति के सदस्यों को भी इन काल्पनिक किताबों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पार्टी ने इस मामले की पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। उसने कहा कि जांच के जरिए असली दोषियों का पता लगाया जाना चाहिए।