{"_id":"6ae70cbdd4a229a6c40af316","slug":"ramlila-maidan-history-from-jinnah-rally-to-anna-protest-and-now-opposition-rally-explainer-news-2026-11-01","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"एक्सप्लेनर: जहां आंदोलन के लिए जुटा विपक्ष, क्या है उस रामलीला मैदान का 'जिन्ना' से 'अन्ना' तक का इतिहास?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
एक्सप्लेनर: जहां आंदोलन के लिए जुटा विपक्ष, क्या है उस रामलीला मैदान का 'जिन्ना' से 'अन्ना' तक का इतिहास?
Sun, 01 Nov 2026 03:26 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sun, 01 Nov 2026 03:26 PM IST
सार
जिस रामलीला मैदान में विपक्ष ने एकजुट होकर सीईसी के खिलाफ आवाज उठाने का लक्ष्य रखा है, उसका भारत की आजादी से पहले और आजादी के बाद का इतिहास क्या है? इस मैदान ने कौन-कौन से बड़े घटनाक्रम और आंदोलन देखे हैं, जिन्हें इतिहास में आज भी याद किया जाता है? साथ ही इस मैदान की खास बात क्या है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
रामलीला मैदान का इतिहास।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में आज विपक्षी- इंडिया गठबंधन की रैली का आयोजन हुआ। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग (ईसी) की तरफ से आयोजित कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के खिलाफ हुई रैली में अलग-अलग राज्यों से हजारों लोगों का जुटाव हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास से रवाना हुआ विपक्ष का काफिला राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और विपक्ष के तमाम नेताओं के नेतृत्व में मिंटो रोड से होते हुए रामलीला मैदान पहुंचा, जहां विपक्ष के नेताओं ने बारी-बारी से जनता को संबोधित किया।
बताया जा रहा है कि रामलीला मैदान में विपक्ष ने करीब 10 लाख लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा था। हालांकि, दिल्ली पुलिस का मानना है कि मैदान में 45,000 से 50,000 लोग पहुंचे और इसके लिए कड़े इंतजाम भी किए गए।
इस बीच यह जानना अहम है कि जिस रामलीला मैदान में विपक्ष ने एकजुट होकर सीईसी के खिलाफ आवाज उठाने का लक्ष्य रखा है, उसका भारत की आजादी से पहले और आजादी के बाद का इतिहास क्या है? इस मैदान ने कौन-कौन से बड़े घटनाक्रम और आंदोलन देखे हैं, जिन्हें इतिहास में आज भी याद किया जाता है? साथ ही इस मैदान की खास बात क्या है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
विज्ञापन
बताया जा रहा है कि रामलीला मैदान में विपक्ष ने करीब 10 लाख लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा था। हालांकि, दिल्ली पुलिस का मानना है कि मैदान में 45,000 से 50,000 लोग पहुंचे और इसके लिए कड़े इंतजाम भी किए गए।
विज्ञापन
इस बीच यह जानना अहम है कि जिस रामलीला मैदान में विपक्ष ने एकजुट होकर सीईसी के खिलाफ आवाज उठाने का लक्ष्य रखा है, उसका भारत की आजादी से पहले और आजादी के बाद का इतिहास क्या है? इस मैदान ने कौन-कौन से बड़े घटनाक्रम और आंदोलन देखे हैं, जिन्हें इतिहास में आज भी याद किया जाता है? साथ ही इस मैदान की खास बात क्या है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
Trending Videos
पहले जानें- क्या है रामलीला मैदान का इतिहास?
1. बहादुर शाह जफर ने जिस मैदान पर रामलीला का मंचन करवाया, वही रामलीला मैदान बनाबताया जाता है कि जिस जगह को आज रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है, वह प्राचीन काल में 10 एकड़ में फैला तालाब था और उसके बाद यहां खेत उग आए। यह मैदान इंद्रपत गांव का हिस्सा था। प्रचलित है कि 1850 के दशक में पहली बार मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने यहां रामलीला मंचन शुरू करवाया। समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरु कर दिया, जिसके चलते इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई।
2. अंग्रेजों ने रामलीला रुकवाई, मदन मोहन मालवीय ने फिर शुरू करवाई
- भारत के अंग्रेजों के शासन में आने के बाद ब्रिटिश शासन ने यहां रामलीला के मंचन पर रोक लगाई और 1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए इस जगह को अपने कब्जे में ले लिया। एक लंबे समय तक इस जगह फिर कभी रामलीला नहीं हुई।
- साल 1911 में पं. मदन मोहन मालवीय की कोशिशों से एक बार फिर इस मैदान को रामलीला मंचन के लिए हासिल कर लिया गया। तब से हर साल यहां रामलीला का आयोजन होता रहा।
अब जानें- किन बड़े घटनाक्रमों का गवाह बना रामलीला मैदान?
1. आजादी से पहले देखे कई आंदोलन
- कभी साल में सिर्फ एक बार रामलीला मंचन का केंद्र कहा जाने वाला रामलीला मैदान धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन से जुड़े कार्यक्रमों और उसके खिलाफ होने वाली सियासी गतिविधियों का केंद्र भी बना।
- कहा जाता है कि इसी मैदान पर 1945 में एक रैली में भीड़ ने जिन्ना को मौलाना की उपाधि दे दी थी। हालांकि, जिन्ना ने मौलाना की इस उपाधि पर नाराजगी जताई और कहा कि वो सियासी नेता है न कि धार्मिक मौलाना।
- इसके अलावा रामलीला मैदान से जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल समेत तमाम स्वतंत्रता सेनानियों ने जनता में आजादी की अलख जगाई और उन्हें आंदोलनरत किया।
- 1952 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रामलीला मैदान में ही जम्मू कश्मीर के मुद्दे को लेकर सत्याग्रह किया था। कहा जाता है कि इससे तत्कालीन नेहरू सरकार खासी प्रभावित भी हुई थी।
ये भी पढ़ें: 'दुकानें बंद रहेंगी तो खरीदारी कहां से होगी?': राहुल गांधी की अपील पर व्यापारियों का तीखा सवाल; फिर लिखा पत्र
रामलीला मैदान।
- फोटो : अमर उजाला
2. आजादी के बाद बना अहम घटनाक्रमों का गवाह
- 1955 में इस मैदान की बाउंड्री बनाई गई और स्थायी मंच का निर्माण हुआ। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भी कई रैलियों का यह मैदान गवाह बना। उन्होंने 1956 और 1957 में मैदान में विशाल जनसभाएं कीं।
- इस मैदान पर न केवल देश के नेता, बल्कि यहां विदेशी गणमान्य व्यक्तित्वों का भी स्वागत हुआ। जनवरी 1961 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने यहां एक बड़ी जनसभा को संबोधित भी किया था।
- भारत-चीन युद्ध के बाद वर्ष 1963 में लता मंगेशकर ने यहां पीएम नेहरू की मौजूदगी में देशभक्ति गीत- 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया, जिससे देशवासियों का हौसला और बढ़ा।
- 1965 में लाल बहादुर शास्त्री की एक रैली के दौरान यहां से प्रसिद्ध नारा- जय जवान, जय किसान भी गूंजा, जिसने पाकिस्तान से युद्ध के बीच देशवासियों को जोश से भर दिया था।
सरकार के खिलाफ वह प्रदर्शन, जिसने मैदान को दी नई पहचान
अपने पिता की तरह ही इंदिरा गांधी ने भी रामलीला मैदान के महत्व को समझा। 1971 में जब भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में परास्त करने के बाद जब अलग बांग्लादेश का निर्माण कराने में अहम भूमिका निभाई तो इसकी जीत का जश्न मनाने के लिए बड़ी रैली का आयोजन किया। यहां तब हजारों की संख्या में लोग जुटे थे।हालांकि, एक आंदोलन ऐसा भी रहा, जिसने इंदिरा गांधी को ही हिला दिया। 25 जून 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विरोध किया और सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। यहीं से रामधारी सिंह दिनकर की लोकप्रिय पंक्तियां- 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' का नारा गूंजा और इंदिरा सरकार के खिलाफ माहौल बना। इसके बाद देश में आपातकाल की स्थिति बनी।
फिर 1977 में कई विपक्षी नेताओं ने यहां एकत्र होकर जनता पार्टी की नींव रखी, जिसमें मोरारजी देसाई, चौ. चरण सिंह, चंद्रशेखर अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य नेता शामिल थे। इसी जनता पार्टी ने आपातकाल के बाद देश पर बेहद कम समय के लिए शासन भी किया।
ये भी पढ़ें: रामलीला मैदान महारैली: 10 लाख लोगों के जुटने का दावा, पुलिस को 70 हजार के आने का अनुमान; सात हजार जवान तैनात
आपातकाल का दौर
- फोटो : अमर उजाला
21वीं सदी में दो अहम जुटाव, जिनसे हिल गईं सरकारें
1. बाबा रामदेव का काले धन को लेकर प्रदर्शन
साल 2011 में बाबा रामदेव ने यहां भ्रष्टाचार और विदेश में जमा काले धन के मुद्दे पर यहीं से अनशन की शुरुआत की और उनके समर्थकों ने यहां प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि यहां उस दौरान 65,000 लोग जुटे थे। हालांकि, तब इस कार्यक्रम के दौरान दिल्ली पुलिस की आधी रात को हुई कार्रवाई को भी याद किया जाता है, तब रामदेव के समर्थकों पर लाठीचार्ज हुआ और उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए।
2. अन्ना हजारे का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन
इसी साल सरकार के खिलाफ सबसे बड़े प्रदर्शन अगस्त में हुए थे। तब प्रदर्शन का चेहरा बने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे। मांग थी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल विधेयक लाने की। कई दिनों तक चले अन्ना के अनशन और इस प्रदर्शन ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार को बेचैन कर दिया। माना जाता है कि यह प्रदर्शन उन कुछ घटनाक्रमों में शामिल था, जिससे कांग्रेस के खिलाफ देशभर में नकारात्मक स्थितियां बन गईं।
2011 के अन्ना आंदोलन का गवाह बना रामलीला मैदान।
- फोटो : अमर उजाला
3. अरविंद केजरीवाल-रेखा गुप्ता ने यहीं ली थी मुख्यमंत्री पद की शपथ
- वर्ष 2013 में एक और ऐतिहासिक क्षण आया, जब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह पहली बार था, जब रामलीला मैदान में किसी सीएम की शपथ हुई थी।
- 20 फरवरी 2025 को एक बार फिर यहां मुख्यमंत्री का शपथग्रहण हुआ। 27 साल बाद भाजपा सरकार बनने के बाद रेखा गुप्ता का मुख्यमंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण समारोह यहीं हुआ था।