अध्ययन: बच्चों में हिंसक व्यवहार के शुरुआती संकेत 6 माह में ही; एक साल की उम्र में दिख सकता है असर
पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में आठ साल के बच्चे ने छह साल की बच्ची पर जिस तरह हमला किया, उसने अभिभावकों और शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। बच्ची को गंभीर चोटें आईं और उसे इलाज के लिए पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराना पड़ा। घटना की वजह की जांच जारी है, लेकिन इसने बच्चों में बढ़ते आक्रामक व्यवहार को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। बेंगलुरु में 195 मां-बच्चों पर हुए एक अध्ययन में सामने आया है कि छह महीने की उम्र में बच्चे का ज्यादा चिड़चिड़ा होना और उसके रोने पर मां की कम संवेदनशील प्रतिक्रिया का संबंध एक साल की उम्र में उसके आक्रामक व्यवहार से हो सकता है। यानी बच्चे के व्यवहार को समझने की शुरुआत बहुत छोटी उम्र से ही जरूरी है। यह अध्ययन इन्फेंट बिहेवियर एंड डेवलपमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसमें निमहांस बंगलूरू, सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल और मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता शामिल थे।
हिंसक व्यवहार के पीछे केवल एक ही वजह नहीं
195 मां-बच्चों पर हुआ अध्ययन
बंगलूरू चाइल्ड हेल्थ एंड डेवलपमेंट स्टडी के तहत 195 मां और उनके बच्चों पर यह अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने छह महीने की उम्र में बच्चों के स्वभाव और उनके रोने या परेशान होने पर मां की प्रतिक्रिया का आकलन किया। इसके बाद एक साल की उम्र में बच्चों के व्यवहार की जांच की गई। अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों का स्वभाव ज्यादा चिड़चिड़ा था, उनमें एक साल की उम्र में आक्रामक व्यवहार, बात न मानने और जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहने जैसी दिक्कतें ज्यादा देखी गईं। बच्चे के रोने या परेशान होने पर मां की कम संवेदनशील प्रतिक्रिया का भी इन व्यवहारों से अलग संबंध मिला। यानी बच्चे का चिड़चिड़ापन और मां की प्रतिक्रिया, दोनों ही उसके बाद के व्यवहार से जुड़े पाए गए।
बच्चे के रोने पर मां की प्रतिक्रिया भी अहम
मनोवैज्ञानिक डॉ. एके शर्मा के मुताबिक, छोटे बच्चे अभी गुस्से और निराशा को संभालना सीख रहे होते हैं। ऐसे में जब बच्चा रोता है या परेशान होता है, तो उसे डांटने या अनदेखा करने के बजाय उसकी परेशानी समझना और शांत करने की कोशिश करना जरूरी है। इससे बच्चे को धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को संभालना सीखने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने भी अपने अध्ययन में कहा है कि चिड़चिड़े स्वभाव वाले बच्चों के माता-पिता को बच्चे के व्यवहार और उसकी जरूरतों को समझने में अतिरिक्त मदद दी जानी चाहिए।
घर का माहौल और हिंसक सामग्री भी जांच के दायरे में
मनोवैज्ञानिक डॉ. एके शर्मा का कहना है कि किसी बच्चे के हिंसक व्यवहार के पीछे एक ही वजह मानना सही नहीं है। यह देखना जरूरी है कि बच्चे ने घर या आसपास मारपीट और हिंसा देखी है या नहीं, उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ है या वह किसी मानसिक तनाव से गुजर रहा है। मोबाइल और टीवी पर हिंसक सामग्री देखना, बिना निगरानी के स्क्रीन का इस्तेमाल और घर में लगातार झगड़े भी बच्चे के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
डॉ. शर्मा के मुताबिक, घटना को अंजाम देने वाले बच्चे की मनोदशा और उसके व्यवहार के पीछे की परिस्थितियों को समझना जरूरी है। आठ साल की उम्र में भी बच्चे गुस्से पर काबू रखना, अपनी भावनाओं को संभालना और तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना सीख रहे होते हैं। इतनी गंभीर घटना को सामान्य बच्चों की लड़ाई समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
स्कूलों में भी बच्चों को गुस्सा संभालना सिखाएं
डॉ. शर्मा के अनुसार, स्कूलों में शुरुआती कक्षाओं से ही बच्चों को गुस्सा संभालना, अपनी बात कहकर विवाद सुलझाना और जरूरत पड़ने पर बड़ों से मदद मांगना सिखाया जाना चाहिए। अगर बच्चा बार-बार दूसरे बच्चों को मारता है, चोट पहुंचाता है, चीजें तोड़ता है या गुस्से पर काबू नहीं रख पाता, तो अभिभावकों को बाल मनोवैज्ञानिक या बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।