बलरामपुर। भारत-नेपाल सीमा पर 27 नेपाली नागरिकों के भारतीय पहचान पत्र और मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के मामले की जांच अब सिर्फ दर्ज एफआईआर तक सीमित नहीं रह गई है। जांच का फोकस अब उस पूरी प्रक्रिया पर है, जिसके जरिये वर्षों पहले नेपाली नागरिक भारतीय अभिलेखों का हिस्सा बनते चले गए। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस नेटवर्क की जड़ें करीब तीन दशक पुरानी हैं।
ऐसे में 1990 के दशक से अब तक तैयार हुई मतदाता सूचियों, निवास प्रमाणपत्रों और पहचान संबंधी अभिलेखों को खंगालने की तैयारी शुरू हो गई है। 1992 के आसपास मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के दौरान सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर नए नाम जोड़े गए थे। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि एफआईआर में नामजद 27 लोगों की भारतीय पहचान की शुरुआत आखिर किस दस्तावेज से हुई।
एफआईआर के अनुसार अधिकांश आरोपियों का मूल निवास नेपाल के जिला डांग के कोईलाबास क्षेत्र में है, जबकि भारत में उन्होंने बालापुर (अनवरडीह), शीतलापुर, रिजवान गली और नई बाजार के पते दर्ज कराए। इन्हीं पतों के आधार पर भारतीय मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज तैयार हुए। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इन पतों का वास्तविक मालिक कौन है, वहां ये लोग कभी रहे भी थे या नहीं और निवास सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया था।
क्षेत्र में पूर्व सांसद का था दबदबा
जांच का सबसे संवेदनशील पहलू शीतलापुर और रिजवान गली बनकर उभरा है। शीतलापुर क्षेत्र में पूर्व सांसद रिजवान जहीर का आवास है। जिस स्थान से उन्होंने वर्षों पहले अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, वही इलाका बाद में रिजवान गली के नाम से जाना जाने लगा। 1989 में सियासत में कदम बढ़ाने के बाद रिजवान जहीर का कद लगातार बढ़ता रहा। उनका पूरे इलाके में खासा दबदबा रहा और नेपाल में उनकी खास पहचान भी हमेशा चर्चा में रही। एफआईआर में नामजद कई नेपाली नागरिकों ने इन्हीं दोनों स्थानों के पते अपने दस्तावेजों में दर्ज कराए हैं। एफआईआर में दर्ज नामों में अब्दुल कादिर सिद्दीकी, सलीम सिद्दीकी, अब्दुल अलीम सिद्दीकी, अब्दुल वहीद सिद्दीकी, अब्दुल करीम सिद्दीकी, कमाल अहमद, शाहिद अख्तर, सनाउल्ला सिद्दीकी, यासिर अराफात, मोहम्मद अनस सिद्दीकी सहित अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि सूची में शामिल अब्दुल रहमान बताए गए भारतीय पते पर रहता ही नहीं था, जबकि अब्दुल अजीज सिद्दीकी की मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उनका नाम अभिलेखों में दर्ज मिला।
सियासी कनेक्शन पर भी टिकी नजर
सूत्र बताते हैं कि विवेचना अब केवल 27 लोगों तक सीमित नहीं रहेगी। पुलिस निर्वाचन विभाग, आधार पंजीकरण एजेंसियों, राजस्व विभाग, ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों से रिकॉर्ड जुटा रही है। यह भी देखा जाएगा कि इन लोगों ने भारतीय पहचान के आधार पर राशन, आयुष्मान, पेंशन, बैंकिंग सुविधाओं या अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लिया या नहीं। यदि सरकारी धन का लाभ फर्जी पहचान के आधार पर लिया गया है तो उसकी अलग से जांच होगी। जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि क्या यह सिर्फ सीमावर्ती गांवों तक सीमित मामला है या वर्षों से सक्रिय किसी संगठित नेटवर्क का परिणाम। एसपी विकास कुमार ने कहा कि मामले के हर पहलू की गहन जांच की जा रही है।