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सतलुज से पंजाब में भूचालः दिलजीत दोसांझ ने कह दी बड़ी बात, फिल्म बैन पर मचा बवाल

Mon, 06 Jul 2026 11:20 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

फिल्म की कहानी संवेदनशील विषय पर आधारित है। यह फिल्म पंजाब के  मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। 
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सतलुज बैन से मचा हड़कंप - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन संघर्ष और उग्रवाद के दौरान मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ के ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटने के बाद सूबे में नाराजगी का माहौल बन गया है। इस फिल्म पर पहले ही सेंसर बोर्ड कैंची चला चुका है मगर अब यह फिल्म ओटीटी से ही लापता हो गई है। हालांकि इस संदर्भ दलील यह दी जा रही है कि इस फिल्म से खालिस्तान समर्थकों के आंदोलन के पक्ष में माहौल बन सकता है। फिल्म के कुछ हिस्सों का भारत विरोधी ताकतें इस्तेमाल कर पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले माहौल खराब कर सकते हैं। 

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लिहाजा  राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। इसमें कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। हालांकि यह फिल्म 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई थी मगर तीन दिन बाद ही इसे हटा लिया गया। इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभा रहे हैं। पहले इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ रखा गया था। ऐतराज हुआ तो ‘पंजाब 95’ रखा गया। इस पर आपत्ति हुई तो इसे सतलुज के नाम से रिलीज कर दिया गया।

संवेदनशील विषय पर आधारित है कहानी
दरअसल, फिल्म की कहानी संवेदनशील विषय पर आधारित है। यह फिल्म पंजाब के  मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। उन्होंने पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान पुलिस द्वारा किए गए कथित "फेक एनकाउंटर'' और हजारों ''लावारिस'' लाशों के गैर-कानूनी अंतिम संस्कार का पर्दाफाश किया था। बाद में 1995 में वह खुद भी रहस्यमय तरीके से गायब हो
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 गए थे। 

फिल्म में पंजाब पुलिस और तत्कालीन सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली को  बेहद गंभीर और नकारात्मक रूप में दिखाए जाने पर आपत्तियां थीं। सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसमें 120 से अधिक कट लगाए थे। इसी विवाद के चलते फिल्म करीब साढ़े तीन साल तक रिलीज नहीं हो सकी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला
सतलुज को मनमाने ढंग से बैन करने से हैरान और दुखी हूं। एक शक्तिशाली फिल्म जो साहसपूर्वक पंजाब के दर्दनाक इतिहास को उजागर करती है और जसवंत सिंह खालड़ा के बलिदान का सम्मान करती है, उसे इस तरह से चुप नहीं कराया जा सकता है। यह महज सेंसरशिप नहीं है बल्कि यह हमारी सामूहिक स्मृति, सच्चाई औरअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। पंजाब अपने अतीत का सामना दमन से नहीं, बल्कि ईमानदारी से करने का हकदार है। - सुखबीर सिंह बादल, अध्यक्ष, शिअद

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क्यों हटाया जवाब चाहिए?
ऐसी फिल्म को बैन करके पंजाब के जख्मों को कुरदने की कोशिश की गई है। हम कारण जानना चाहते हैं कि इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से क्यों हटाया गया। यह केंद्र सरकार का नया धक्का है। यह फिल्म कांग्रेस द्वारा पंजाब और पंथ की द्वेष की राजनीति की पर आधारित थी। यह कोई फिक्शन फिल्म नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई द्वारा की गई जांच व मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। कांग्रेस और भाजपा मिलकर धक्केशाही कर रही है। - कुलतार सिंह संधवा, स्पीकर, पंजाब विधानसभा

फिल्म संग खालड़ा जैसा हश्र हुआ
इस फिल्म के साथ वही हुआ जो जसवंत सिंह खालड़ा के साथ हुआ था। वे भी अचानक गायब हुए थे और फिल्म भी अचानक लापता हो गई। इंसानियत नाम की भी कोई चीज होती है। मुझे इस बात का दुख नहीं कि फिल्म इंटरनेट से हटा दी गई है। फिल्म तो लोगों तक पहुंच चुकी है। एक बार जो चीज इंटरनेट पर आ जाए, उसे हटाना आसान नहीं। इनके सलाहकार ठीक नहीं है। बहुत से लोगों ने इस फिल्म को डाउनलोड कर लिया है। इसे वायरल करना चाहिए। - दिलजीत दोसांझ,  फिल्म अभिनेता

हो रहा राजनीतिकरण 
यह फिल्म कांग्रेस का काला अध्याय बताती है। भाजपा सच को दबाने में मदद कर रही है। अकाली दल इसका राजनीतिकरण कर रहा है। तीनों ने जसवंत सिंह खालड़ा और पंजाब को धोखा दिया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म से फिल्म को हटाना भाजपा और कांग्रेस की पंजाब के इतिहास को मिटाने की साजिश है। भाजपा और कांग्रेस नहीं चाहतीं कि नई पीढ़ी पंजाब के सबसे काले दौर का सच जाने। - बलतेज पन्नू, प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी
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