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120 फीट नीचे इंजीनियरिंग का कमाल!: कटनी की सुरंग से बदलेगा विंध्य, CM बोले- 'जमीन मत बेचिए, बदलेगी तकदीर'

Fri, 17 Jul 2026 07:36 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कटनी

सार

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कटनी की 11.95 किमी लंबी स्लीमनाबाद जल सुरंग का निरीक्षण किया। इस परियोजना से विंध्य और महाकौशल के 1450 गांवों की 2.45 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलेगी। उन्होंने किसानों से जमीन न बेचने की अपील करते हुए इसे प्रदेश की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग उपलब्धि बताया।
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कटनी की सुरंग का निरीक्षण करने पहुंचे सीएम मोहन यादव - फोटो : अमर उजाला
कटनी जिले में बनी स्लीमनाबाद जल सुरंग अब विंध्य और महाकौशल की तस्वीर बदलने के लिए तैयार है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने देश की सबसे लंबी जल सुरंग का निरीक्षण किया है। जहां उन्होंने टनल में कार्यरत इंजीनियरों और श्रमिकों से चर्चा की, निर्माण कार्य का जायजा लिया और इसे प्रदेश की इंजीनियरिंग क्षमता का अद्भुत उदाहरण बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह परियोजना आने वाले वर्षों में विंध्य की खेती को नई पहचान देगी। उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन न बेचें, क्योंकि सिंचाई की सुविधा मिलने के बाद यही क्षेत्र कृषि उत्पादन के मामले में पंजाब और हरियाणा को भी पीछे छोड़ सकता है। 

बरगी परियोजना अंतर्गत बनी नर्मदा टनल करीब 11.95 किलोमीटर लंबी है। इस जल सुरंग से नर्मदा के पानी को सोन नदी बेसिन तक पहुंचाएगी। इसके जरिए जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना के करीब 1450 गांवों की लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई सुविधा मिलेगी। इसके साथ ही पेयजल संकट से राहत मिलेगी और भविष्य में जलविद्युत उत्पादन की संभावनाएं भी विकसित होंगी। इस परियोजना से विंध्य और महाकौशल की कृषि अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है। 

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कटनी की सुरंग का निरीक्षण करने पहुंचे सीएम मोहन यादव - फोटो : अमर उजाला
सुरंग को 100 साल बाद भी कुछ नहीं होगा, भूकंप भी बेअसर
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि परियोजना के शुरुआती वर्षों में निर्माण कार्य की रफ्तार काफी धीमी थी। वर्ष 2015 तक केवल 1406 मीटर खुदाई हो सकी थी। इसके बाद वर्ष 2016 में जर्मनी से लाई गई अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) की मदद से निर्माण कार्य में तेजी आई। कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों, विशाल चट्टानों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बीच इंजीनियरों, तकनीशियनों और श्रमिकों ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा किया है। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि यह सुरंग करीब 100 वर्षों तक सुरक्षित रहेगी और भीषण भूकंप का भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कई स्थानों पर इसकी गहराई जमीन से 120 फीट तक है। 

परियोजना बनेगी मिसाल
सीएम ने कहा कि भविष्य में इंजीनियरिंग संस्थानों में इस परियोजना का अध्ययन केस स्टडी के रूप में किया जाएगा। निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा और कहा कि कांग्रेस शासनकाल में प्रदेश का सिंचित रकबा केवल 7.5 लाख हेक्टेयर था। उन्होंने कहा कि नदियां भी यहीं थीं, जंगल भी यहीं थे और तकनीक भी उपलब्ध थी, लेकिन काम करने की इच्छाशक्ति नहीं थी। इसी वजह से किसानों को वर्षों तक पर्याप्त सिंचाई सुविधाएं नहीं मिल सकीं और सरकारें उन्हें उनकी समस्याओं के बीच छोड़ती रहीं। लेकिन भाजपा सरकार आते ही हमने सिंचाई क्षमता बढ़ाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में सिंचित रकबा बढ़कर 44 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा। वहीं, वर्तमान सरकार के ढाई वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 65 लाख हेक्टेयर के पार हो गया है। उन्होंने कहा कि स्लीमनाबाद जल सुरंग जैसी परियोजनाएं इसी सोच का परिणाम हैं, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देंगी। 

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कटनी की सुरंग का निरीक्षण करने पहुंचे सीएम मोहन यादव - फोटो : अमर उजाला
विज्ञान और इंजीनियरिंग का चमत्कार
मुख्यमंत्री ने कहा कि अब तक नर्मदा का जल खंभात की खाड़ी में जाकर मिल जाता था, लेकिन इस ऐतिहासिक सुरंग के माध्यम से पहली बार नर्मदा का पानी गंगा बेसिन के सोन नदी क्षेत्र तक पहुंचेगा। उन्होंने इसे विज्ञान और इंजीनियरिंग का चमत्कार बताते हुए कहा कि इससे विंध्य और महाकौशल की खेती, व्यापार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी। लगभग 1600 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में केंद्र सरकार ने भी करीब 275 करोड़ रुपये का योगदान दिया है। निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने सुरंग के भीतर कार्यरत श्रमिकों से बातचीत कर उनका उत्साहवर्धन किया और उनके कार्य की सराहना की। दौरे के बाद उन्होंने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर लगातार कई पोस्ट साझा करते हुए इस परियोजना को मध्य प्रदेश की इंजीनियरिंग क्षमता, किसान समृद्धि और जल प्रबंधन की ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। 
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